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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013
दशहरा
आग लगाकर इक पुतले को परचम लहराएगी जनता
असली रावण मंच विराजित जय कारे गायेंगी जनता
दस शीशों से पहचाना था जिस रावण को पुरुषोत्तम ने
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?
कुम्भकरण भर पेट पड़े हैं इन्द्रप्रस्थ के दरबारों में
भांति भांति के इन्द्रजीत हैं गली गली में चौबारों में
चोरों की चौपाल जहाँ हो वहां भला क्या होगी समता
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?
दूषित मन की अभिलाषाएं अखबारों की ताजा ख़बरें
चौराहे पर स्वेत वस्त्र में लिपटे हैं लावारिश सपने
लोकतंत्र में गांधी जी की तस्वीरों की मन में ममता (मुद्रा ..पैसा )
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?
आदर्शों की पगडण्डी पर चलना केवल सपने जैसा
....सत्य शब्द के नयें अर्थ हैं झूठे वादे करने जैसा
कर्म कुकर्म न हो यदि तेरा जीने का फिर हक़ ना बनता
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?............... मनोज
कट रही है जिन्दगी
कट रही है जिन्दगी मौत की तलवार पर
नाव डोले जा रही है वक्त के मझदार पर ।।
आम जनता की किसे परवाह है खुद देखिये
सरकार की चाहत लिए सब चिढ रहे सरकार पर ।।
रोटियों की फ़िक्र में कुचला उसे जिस सड़क पर
आज फिर चलने लगी है जिन्दगी रफ़्तार पर ।।
श्री राम मर्यादा पुरुष आदर्श था जिस कौम का
चोर लक्ष्मी के वही हैं खबर है अखबार पर ।।
जिन्दगी में बोझ क्या है पूछिए उस शख्स से
है जेब खाली जिंदगी भी बोझ है परिवार पर ।।..............मनोज
नाव डोले जा रही है वक्त के मझदार पर ।।
आम जनता की किसे परवाह है खुद देखिये
सरकार की चाहत लिए सब चिढ रहे सरकार पर ।।
रोटियों की फ़िक्र में कुचला उसे जिस सड़क पर
आज फिर चलने लगी है जिन्दगी रफ़्तार पर ।।
श्री राम मर्यादा पुरुष आदर्श था जिस कौम का
चोर लक्ष्मी के वही हैं खबर है अखबार पर ।।
जिन्दगी में बोझ क्या है पूछिए उस शख्स से
है जेब खाली जिंदगी भी बोझ है परिवार पर ।।..............मनोज
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