हमारे हौसले अब भी उन्हें छू कर निकलते हैं
उन्हें शक है मुहोब्बत में कई शोले पिघलते हैं ।।
कोई अनजान सा गम है जुदाई के पलों का भी
ये कैसी आग है जिसमे बिना जल कर सुलगते हैं ।।
खफा होती हुयी जब भी दिखाई दी हमें चाहत
खता कुछ भी नहीं रहती बिना कारण चहकते हैं ।।
सुना है आज कल उनकी गली में हुश्न तनहा है
घडी भर दीद करने को भला क्यूँ कर हिचकते हैं ।।
खयालों में कभी उसने हमें हर पल सजाया था
शबाब- ए- मुश्क से हर ख्वाब रातों में महकते हैं ।।
अदाओं से निगाहों से हजारों क़त्ल कर डाले
यही तो बात है तुम में इसी कर हम बहकते हैं ।। ......मनोज
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बुधवार, 13 फ़रवरी 2013
मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013
अर्थ रह गए गलियारों में शब्द बिक रहे बाजारों में
अर्थ रह गए गलियारों में शब्द बिक रहे बाजारों में
रचनाओं के सृजन कर्ता भटक रहे हैं अंधियारों में ।।
केवट भी तो तारक ही था जिसने तारा तारन हारा
कलयुग में ये दोनों अटके विषयों के मझधारों में ।।
कृष्ण नीति की पुस्तक गीता सच्चाई को तरसे देखो
हर धर्म धार दे रहा बेहिचक आतंकी के औजारों में ।।
मंदिर मस्जिद घूम रहा है धर्म नहीं है जिस पंछी का
धर्म ज्ञान को रखने वाला झुलस रहा है अंगारों में ।।
धर्मों के बोझे हैं भारी थक कर चूर हो गया इन्सां
शांति युद्ध की स्वरलहरी अब सुनते हैं परिवारों में ।।
रावण के पुतले को मिलकर आग लगाने वालों सुन लो
पंडित सच्चा लड़ा विष्णु से राक्षस एक हजारों में ।।
सीता को सम्मान सहित था रखा राज्य में ये भी पढ़ लो
बारम्बार प्रणाम राम को छोड़ा जिसने गलियारों में ।।
कुछ अपने संस्कारों के भी आओ थोडा दर्शन कर लो
नोची अबला किसी गिद्ध ने सिद्ध बने जो अखबारों में ।।......मनोज
रचनाओं के सृजन कर्ता भटक रहे हैं अंधियारों में ।।
केवट भी तो तारक ही था जिसने तारा तारन हारा
कलयुग में ये दोनों अटके विषयों के मझधारों में ।।
कृष्ण नीति की पुस्तक गीता सच्चाई को तरसे देखो
हर धर्म धार दे रहा बेहिचक आतंकी के औजारों में ।।
मंदिर मस्जिद घूम रहा है धर्म नहीं है जिस पंछी का
धर्म ज्ञान को रखने वाला झुलस रहा है अंगारों में ।।
धर्मों के बोझे हैं भारी थक कर चूर हो गया इन्सां
शांति युद्ध की स्वरलहरी अब सुनते हैं परिवारों में ।।
रावण के पुतले को मिलकर आग लगाने वालों सुन लो
पंडित सच्चा लड़ा विष्णु से राक्षस एक हजारों में ।।
सीता को सम्मान सहित था रखा राज्य में ये भी पढ़ लो
बारम्बार प्रणाम राम को छोड़ा जिसने गलियारों में ।।
कुछ अपने संस्कारों के भी आओ थोडा दर्शन कर लो
नोची अबला किसी गिद्ध ने सिद्ध बने जो अखबारों में ।।......मनोज
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