शनिवार, 16 अगस्त 2025

कामकला काली साधना विधान

“काम कला काली” (Kāma Kalā Kālī) के साधना अत्यंत गुप्त तांत्रिक परंपरा का हिस्सा है, जो काम शक्ति (यौन ऊर्जा) को काली उपासना में समर्पित करके साधक को सिद्धि, मोक्ष, रति-आनंद, आकर्षण और भोग-विलास दिलाती है।

🔱 काम कला काली का स्वरूप

यह काली का कामरूप है, जो रति और तांत्रिक मैथुन से जुड़ी है।

इन्हें कामकलामयी महाकाली, कामेश्वरी काली, या रतिरूपिणी काली भी कहा गया है।

इनकी पूजा मुख्यतः कामकला तंत्र, वाममार्ग साधना, और तांत्रिक मैथुन में की जाती है।

🕉️ साधना का समय और स्थान

समय: अर्धरात्रि (विशेषकर अमावस्या, गुप्त नवरात्रि, काली जयंती)

स्थान: श्मशान, एकांत मंदिर, या गुप्त कक्ष

दिशा: दक्षिण या पूर्व की ओर मुख

व्रत: मांस, मदिरा, मैथुन आदि पंचमकारक का उपयोग तांत्रिक परंपरा अनुसार

🔮 आवश्यक सामग्री

कामकला काली यंत्र (भोजपत्र/ताम्रपत्र पर सिद्ध)

काली का चित्र/मूर्ति (कामरूप स्वरूप)

लाल वस्त्र

रक्तवर्णी फूल (गुड़हल, कमल)

चंदन, सिंदूर, काजल

मदिरा, मांस, मछली, मुद्रा, मैथुन (पंचमकारक)

इत्र, धूप, घी का दीपक

1️⃣ संकल्प

ॐ महाकाल्यै कामकलामयी देवी नमः  
अहं अमुक कार्य सिद्ध्यर्थे कामकला काली साधनां करिष्ये॥

2️⃣ आवाहन मंत्र

ॐ क्रीं कालिकायै कामकलारूपिण्यै आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नमः॥

3️⃣ मूल मंत्र

कामकला काली का गुप्त मंत्र:

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कामकलायै कालिकायै नमः॥

108 या 1008 बार जप करें।

माला: रुद्राक्ष या अर्द्धरत्न (स्पटिक/कौड़ी)।

4️⃣ तांत्रिक मैथुन साधना (गुप्त भाग)

साधक और साधिका (दीक्षित जोड़ा) मिलकर काली यंत्र के सामने बैठें।

काली मंत्र का जप करते हुए रति-क्रिया करें।

चरमोत्कर्ष (orgasm) के समय मंत्र का उच्चारण और ध्यान काली के रति स्वरूप पर केंद्रित हो।

वीर्य और रज को कामकला अमृत मानकर देवी को अर्पित समझें।

इससे शक्ति का रूपांतरण (Transmutation) होता है और साधक को तांत्रिक सिद्धि मिलती है।

5️⃣ साधना के फल

अपार आकर्षण और सम्मोहन शक्ति

रति और यौन आनंद की पराकाष्ठा

तांत्रिक सिद्धि और भोग-विलास की प्राप्ति

धन, समृद्धि और ऐश्वर्य

साधक के भीतर छिपी कुंडलिनी शक्ति का जागरण

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

कामाख्या योनि स्तुतिगान

प्रिय साधक~साधिकाओं माँ कामाख्या जी का योनि रूप में पूजा की जाती हैं और योनि स्तुति सब पापों को मुक्त करती हैं जो इसका नित्य पाठ करता हैं नियमित इसको अधिकतर विद्धान लोग गुप्त रखे हैं पर हम तो ठहरे अघोरी साधको के ज्ञान के लिए सब रहस्य खोल दूँ कई विद्धान बोले की यह गुप्त हैं मत करो सार्वजनिक पर हम कहते हैं की हर गृहस्थ अघोरी नही बन सकता केवल साधरण पूजा पाठ कर सकता हैं।
ऐसे अपने साधक-साधिका के सुविधा के लिए हम दुर्लभ योनि तन्त्र को सबके लिए सुलभ कर रहे हैं हर कोई इसका पाठ करके लाभ उठाये !!!
_____________________________________
नियन~ योनि स्तुति पाठ के नियम कोई कठिन नही हैं रोज सुबह अपने नित्य कर्मो से निवृत होकर स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनकर धूप-दीप जलाकर पाठ करे !!!
: योनिस्तोत्रम्
"""""""""""""""""""""""""""""""
ॐभग-रूपा जगन्माता सृष्टि-स्थिति-लयान्विता ।
दशविद्या - स्वरूपात्मा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।१।।
कोण-त्रय-युता देवि स्तुति-निन्दा-विवर्जिता ।
जगदानन्द-सम्भूता योनिर्मां पातु सर्वदा ।।२।।
कात्र्रिकी - कुन्तलं रूपं योन्युपरि सुशोभितम् ।
भुक्ति-मुक्ति-प्रदा योनि: योनिर्मां पातु सर्वदा ।।३।।
वीर्यरूपा शैलपुत्री मध्यस्थाने विराजिता ।
ब्रह्म-विष्णु-शिव श्रेष्ठा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।४।।
योनिमध्ये महाकाली छिद्ररूपा सुशोभना ।
सुखदा मदनागारा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।५।।
काल्यादि-योगिनी-देवी योनिकोणेषु संस्थिता ।
मनोहरा दुःख लभ्या योनिर्मां पातु सर्वदा ।।६।।
सदा शिवो मेरु-रूपो योनिमध्ये वसेत् सदा ।
वैâवल्यदा काममुक्ता योनिर्मां पातु सर्वदा ।।७।।
सर्व-देव स्तुता योनि सर्व-देव-प्रपूजिता ।
सर्व-प्रसवकत्र्री त्वं योनिर्मां पातु सर्वदा ।।८।।
सर्व-तीर्थ-मयी योनि: सर्व-पाप प्रणाशिनी ।
सर्वगेहे स्थिता योनि: योनिर्मां पातु सर्वदा ।।९।।
मुक्तिदा धनदा देवी सुखदा कीर्तिदा तथा ।
आरोग्यदा वीर-रता पञ्च-तत्व-युता सदा ।।१०।।
योनिस्तोत्रमिदं प्रोत्तंâ य: पठेत् योनि-सन्निधौ ।
शक्तिरूपा महादेवी तस्य गेहे सदा स्थिता ।।११।।
।। इति योनि स्तोत्रं सम्पूर्ण।।

अंबुवाची पर्व में माता कामाख्‍यादेवी रजस्‍वला हो जाती है । इस के पूर्व इस स्‍तोत्र से उस की सेवा किजीये और देखीये कितने अदभूत चमत्‍कार अपने आप को देखने केा मिलते है ।

नव ग्रह पीड़ा हरण मंत्र

ग्रहों से होने वाली पीड़ा का निवारण करने
"""""""""""""""""""""""""""""""'""""""""
के लिए इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत लाभदायक है। इसमें सूर्य से लेकर हर ग्रहों से क्रमश: एक-एक श्लोक के द्वारा पीड़ा दूर करने की प्रार्थना की
गई है-

ग्रहाणामादिरात्यो लोकरक्षणकारक:। विषमस्थानसम्भूतां
पीड़ां हरतु मे रवि: ।।1।।
रोहिणीश: सुधामूर्ति: सुधागात्र: सुधाशन:।
विषमस्थानसम्भूतां पीड़ां हरतु मे विधु: ।।2।।
भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत् सदा। वृष्टिकृद् वृष्टिहर्ता च
पीड़ां हरतु में कुज: ।।3।।
उत्पातरूपो जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति:। सूर्यप्रियकरो विद्वान्
पीड़ां हरतु मे बुध: ।।4।।
देवमन्त्री विशालाक्ष: सदा लोकहिते रत:।
अनेकशिष्यसम्पूर्ण:पीड़ां हरतु मे गुरु: ।।5।।
दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:। प्रभु:
ताराग्रहाणां च पीड़ां हरतु मे भृगु: ।।6।।
सूर्यपुत्रो दीर्घदेहा विशालाक्ष: शिवप्रिय:। मन्दचार:
प्रसन्नात्मा पीड़ां हरतु मे शनि: ।।7।।
अनेकरूपवर्णेश्च शतशोऽथ सहस्त्रदृक्। उत्पातरूपो जगतां
पीडां पीड़ां मे तम: ।।8।।
महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबल:।
अतनुश्चोर्ध्वकेशश्च पीड़ां हरतु मे
शिखी: ।।9।।
भावार्थ -
ग्रहों में प्रथम परिगणित, अदिति के पुत्र तथा विश्व
की रक्षा करने वाले भगवान सूर्य विषम स्थानजनित
मेरी पीड़ा का हरण करें ।।1।।
दक्षकन्या नक्षत्र रूपा देवी रोहिणी के
स्वामी, अमृतमय स्वरूप वाले, अमतरूपी
शरीर वाले तथा अमृत का पान कराने वाले चंद्रदेव विषम
स्थानजनित मेरी पीड़ा को दूर करें ।।2।।
भूमि के पुत्र, महान् तेजस्वी, जगत् को भय प्रदान
करने वाले, वृष्टि करने वाले तथा वृष्टि का हरण करने वाले मंगल
(ग्रहजन्य) मेरी पीड़ा का हरण करें ।।
3।।
जगत् में उत्पात करने वाले, महान द्युति से संपन्न, सूर्य का प्रिय
करने वाले, विद्वान तथा चन्द्रमा के पुत्र बुध मेरी
पीड़ा का निवारण करें ।।4।।
सर्वदा लोक कल्याण में निरत रहने वाले, देवताओं के
मंत्री, विशाल नेत्रों वाले तथा अनेक शिष्यों से युक्त
बृहस्पति मेरी पीड़ा को दूर करें ।।5।।
दैत्यों के मंत्री और गुरु तथा उन्हें
जीवनदान देने वाले, तारा ग्रहों के स्वामी,
महान् बुद्धिसंपन्न शुक्र मेरी पीड़ा को दूर
करें ।।6।।
सूर्य के पुत्र, दीर्घ देह वाले, विशाल नेत्रों वाले, मंद
गति से चलने वाले, भगवान् शिव के प्रिय तथा प्रसन्नात्मा शनि
मेरी पीड़ा को दूर करें ।।7।।
विविध रूप तथा वर्ण वाले, सैकड़ों तथा हजारों आंखों वाले, जगत के
लिए उत्पातस्वरूप, तमोमय राहु मेरी पीड़ा
का हरण करें ।।8।।
महान शिरा (नाड़ी)- से संपन्न, विशाल मुख वाले, बड़े दांतों वाले, महान् बली, बिना शरीर वाले तथा
ऊपर की ओर केश वाले शिखास्वरूप केतु
मेरी पीड़ा का हरण करें।।9।।

शनिवार, 5 जुलाई 2025

भग मालिनी तंत्र .... 224 अक्षरों का दुर्लभ और अत्यंत तीव्र प्रभावी मंत्र रहस्य

भाग मालिनी तंत्र को हम कामाख्या तंत्र और ललिता तंत्र के नाम से भी जान सकते हैं और वहां यह देवी प्रतिष्ठित हैं। देवी कामाख्या के तंत्रों में अधिकतर हम योनि पूजन शक्तियों के रूप में देवी की आराधना करते हैं।  देवी की योनि का भाग यहां पर गिरा था। इसे योनि शिलाखंड भी कहते हैं जो शक्ति के रूप में पूजित है। यहां एक छोटा सा जल स्त्रोत है। इसकी वजह से यह स्थान सदैव नम बना रहता है। इसमें विशेष गुण भी हैं। इसके सेवन से कई रोग भी दूर होते हैं और कामाख्या में अंबुबाची नाम का मेला लगता है। देवी कामाख्या के रजस्वला होने के कारण ब्रह्मपुत्र का जल लाल रंग का हो जाता है। इसी अवसर पर दुनिया के कोने कोने से तांत्रिक यहां पहुंचते हैं और तंत्र साधना करते हैं। तांत्रिकों का महाकुंभ भी इसे कहा जाता है? असम में कामाख्या देवी मां की साधना को योनि मार्ग से जोड़ा गया क्योंकि यहां पर देवी की योनि गिरी थी। इस रहस्य को अभी तक लोग समझ नहीं पाए हैं और साधनाओ के क्षेत्र में इसे गलत तरीके से देखा जाता है। वास्तव में यह माना जाता है कि जिस प्रकार योनि के माध्यम से ही कोई भी स्त्री नए जीवन को संसार में लेकर के आती है, इसलिए योनि पूजनीय है। इसी तरह ब्रह्मांड योनि ब्रह्मांड पिंड को संसार में और जगत में लेकर आती है। इसीलिए सारा संसार जन्म लेता है। यह देवी की योनी है। इस प्रकार इस चीज को ऐसे समझिये हर ग्रह नक्षत्र पिंड तारा गोल क्यों बनता है। आखिर वह पिंड के आकार में ही क्यों है क्योंकि यह सभी देवी की मानसिक योनि से उत्पन्न हुआ है। इसी को जब तंत्र में साधना के द्वारा सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है तो ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियां प्राप्त होती है। रक्त वर्ण वाली वस्त्र धारण करने वाली देवी माता कामाख्या और उनके अलग अलग खंडित स्वरूप अलग अलग तरीके से पूजित होते हैं। उन्हीं में एक देवी है भग मालिनी देवी भग मालिनी अपनी शक्ति में अत्यंत ही उत्तम है औरभग यानि योनि ही जिसे कहा जाता है, उसकी नित्य शक्ति मानी जाती है। यह योनि में नित्या स्वरूप में स्थित है और प्राचीन भैरवी चक्र की योनि शक्ति के नाम से इन्हें जाना जाता है। श्रीविद्या मुख्य कामाख्या तंत्र हो। दोनों ने देवी भाग मालिनी की साधना का वर्णन हमें देखने को मिलता है। यह देवी अत्यंत गोपनीय रहस्य से युक्त हैं और इन्हें भी आदि शक्ति के रूप में ही पूजा जाता है और यह सारे के सारे स्वरूप माता कामाख्या से संबंधित माने जाते हैं क्योंकि देवी योनि से संबंधित इन रहस्यों को माना गया है। इन देवी का जो मंत्र है, वह काफी बड़ा है। 

ऐं भग भुगे ऐं भगिनि ऐं भगोदरी ऐं भग क्लिन्ने ऐं भगावहे ऐं भग गुह्ये ऐं भग योने ऐं भगनिपातिनि ऐं भग सवेवदि ऐं भग वशंकरी ऐं भगरूपे ऐं भग नित्ये ऐं भग क्लिन्ने ऐं भगस्वरूपे सवेभगानि. में ह्यानय ऐं भगक्लिन्ने द्रवे भगं क्लेदय भगं द्रावय भगामोघे भगविच्चे भगं च्छोभय सवेसत्वान भगेश्वरी ऐं भग ब्लूं ऐं भग जं ऐं भग मे ऐं भग व्लूं ऐं भग मो भग क्लिन्ने सवाेनि भगानि में ऐं भग व्लूं ऐं भग हें भग क्लिन्ने सवाेनि भगानि में वशमानये भग ऐं भग ब्लूं ऐं भग हें ऐं भग ब्लूं ऐं भग हें ऐं द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः भग हर ब्लें भगमालिन्यै

 यह 224 अक्षर का मंत्र कहलाता है और इनकी साधना विशेष शक्ति प्रदान करती खासतौर से अगर किसी को वशीकरण की शक्ति प्राप्त करनी है। इसके लिए यह अद्भुत साधना मानी जाती है। इनकी साधना सिद्ध करने वाले व्यक्ति के पास वशीकरण की अद्भुत शक्ति होती है। यहां तक अगर यह मंत्र पूरी तरह सिद्ध हो जाता है तो संसार में ऐसी कोई स्त्री नहीं है जिसको कोई साधक अपने वश में ना कर सके। जो भी स्त्री इस मंत्र को सिद्ध कर लेती है, वह किसी भी पुरुष को आकर्षित कर सकती हैं। चाहे वह कितना भी सिद्धवान व्यक्ति क्यों ना हो, इसके सिद्ध हो जाने पर काम शक्ति, तेज शक्ति, दृष्टिपात शक्ति तेज शक्ति भी आप समझ गए होंगे। काम शक्ति भी आप समझते हैं लेकिन दृष्टिपात शक्ति का मतलब होता है जिस पर भी हम नजर डालते हैं। उसको अपने वश में करने की शक्ति दूसरी अनेक शक्तियों की प्राप्ति के अतिरिक्त इससे आयु की वृद्धि भी होती है। यह साधनाए रात्रि के समय में एकांत में योनि के सामने करनी चाहिए। योनि के बहुत सारे स्वरूप होते हैं एक। आप यह मान सकते हैं। जीवित योनि, दूसरी है। आपकी तंत्रात्मक योनि यानी आपने किसी यंत्र पर योनि का चिन्ह अंकित किया हो और तीसरी होती है। पृथ्वी पर बनाई गई विशालकाय योनि तो तीनों के सामने ही इस तरह की साधनाएं की जा सकती है। इनका जो स्वरूप है वह इस प्रकार है। खूनी खूनी लाल रंग की जगमगाती हुई सर्वांग सुंदरी देवी जो लाल रंग के वस्त्र सोने के राजसी वस्त्रों से सुसज्जित कमल के फूल पर बैठी हुई जिनके तीन नेत्र हैं, 6 भुजाएं हैं दाये नीचे ऊपर पुष्प वाण है। अंकुश कमल है बाये में कूलहर पाश और सोने का धनुष है। गुप्त गुरु निर्देश में यह योनि शक्ति हैं।

यंत्र भी योनि यंत्र हैं और इनकी साधना भी योनि साधना कहलाती है। इस साधना को करने वाला साधक सर्वोच्च वशीकरण की शक्ति प्राप्त करता है। संसार में हर स्त्री और पुरुष को वश में करने की सामर्थ है। उसके अंदर आ जाती है। यहां मैंने सिर्फ आपको मंत्र के विषय में जानकारी दी है और इसे कैसे करना है, उसकी जानकारी प्रदान की है, लेकिन इसकी पूर्ण सिद्धि के लिए गुरु से ही इस मंत्र की। मूल विधि और सामग्री इत्यादि प्राप्त करके ही इसकी साधना करनी चाहिए क्योंकि यह बहुत ही प्रचंड साधनाएं हैं और इन्हें आप मजाक में नहीं ले सकते हैं। इसमें जो शक्तियां उत्पन्न होती हैं, वह विशेष कृपा करने की क्षमता रखती हैं और असंभव कार्य को संभव बनाने की शक्ति इन साधना के माध्यम से प्रत्येक स्त्री और पुरुष को हो जाती है। स्त्री के लिए यह सौभाग्य और सुंदरता, काम शक्ति, तेज, दृष्टिपात, शक्ति इत्यादि के साथ आयु की वृद्धि देने वाली मानी जाती है और उसके लिए यह हर प्रकार से स्त्री को अपने वश में करने की शक्ति प्रदान करती है।

जय महाकालकाळी 
तंत्र अचार्य , महाकालकाळी उपासक् 
पंडित मनोज कुमार नोटियाल 
पिंजोर , पंचकुला हरियाणा 
मोबाइल-9041032215 

सोमवार, 30 जून 2025

कामख्या स्तोत्र .....सर्व कामना पूर्ण करने वाला सिद्ध स्तोत्र

कामाख्या स्तोत्र

जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

विश्वमूर्ते शुभे शुद्धे विरुपाक्षि त्रिलोचने ।
भीमरुपे शिवे विद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

मालाजये जये जम्भे भूताक्षि क्षुभितेऽक्षये ।
महामाये महेशानि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
कालि कराल विक्रान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

कालि कराल विक्रान्ते कामेश्वरि हरप्रिये ।
सर्व्वशास्त्रसारभूते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

कामरुप – प्रदीपे च नीलकूट – निवासिनि ।
निशुम्भ – शुम्भमथनि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

कामाख्ये कामरुपस्थे कामेश्वरि हरिप्रिये ।
कामनां देहि में नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

वपानाढ्यवक्त्रे त्रिभुवनेश्वरि ।
महिषासुरवधे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

छागतुष्टे महाभीमे कामख्ये सुरवन्दिते ।
जय कामप्रदे तुष्टे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः ।
अष्टम्याच्च चतुदर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः ॥

संवत्सरेण लभते राज्यं निष्कण्टकं पुनः ।
य इदं श्रृणुवादभक्त्या तव देवि समुदभवम् ॥

सर्वपापविनिर्म्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति ।
श्रीकामरुपेश्वरि भास्करप्रभे, प्रकाशिताम्भोजनिभायतानने ।
सुरारि – रक्षः – स्तुतिपातनोत्सुके, त्रयीमये देवनुते नमामि ॥

सितसिते रक्तपिशङ्गविग्रहे, रुपाणि यस्याः प्रतिभान्ति तानि ।
विकाररुपा च विकल्पितानि, शुभाशुभानामपि तां नमामि ॥

कामरुपसमुदभूते कामपीठावतंसके ।
विश्वाधारे महामाये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

अव्यक्त विग्रहे शान्ते सन्तते कामरुपिणि ।
कालगम्ये परे शान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

या सुष्मुनान्तरालस्था चिन्त्यते ज्योतिरुपिणी ।
प्रणतोऽस्मि परां वीरां कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

दंष्ट्राकरालवदने मुण्डमालोपशोभिते ।
सर्व्वतः सर्वंव्गे देवि कामेश्वरि नमोस्तु ते ॥

चामुण्डे च महाकालि कालि कपाल – हारिणी ।
पाशहस्ते दण्डहस्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

चामुण्डे कुलमालास्ये तीक्ष्णदंष्ट्र महाबले ।
शवयानस्थिते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

मेरी पहली कविता जैसी

मेरी पहली कविता जैसी....

बचपन का एहसास जवानी की दहलीजों पर आया जब
प्यार अनकहा यादों की मासूम सरहदों पर आया जब ll
अक्सर पहला प्यार अधूरा किस्सा होता है किस्मत का
और दूसरा प्यार जवानी की जिद भरने को आया जब।।
तब से लेकर मासूमियत की परिभाषा है तुम जैसी
मेरी पहली कविता जैसी....।।

मेरी पहली कविता जैसी चंचलता का सादापन हो
मेरे जीवन में तुम ही बस मेरा एक अधूरापन हो।।
घायल मन की पागल चिंता जब लिखती है कविता कोई
उस कविता में मेरे मन के कल्पवृक्ष का तुम चंदन हो।।
उस चन्दन की शीतलता में तुम ही हो शीतलता जैसी
मेरी पहली कविता जैसी....।।

चन्दन की परछाई में ही मैंने तो अब तक खुद को जाना
रफ कॉपी से बनी डायरी में बुन बैठा मैं ताना बाना।।
उन ताने बाने की कविता को जब भी सुनता है कोई
सब कहते हैँ, उस साँवरिया से है तेरा नेह पुराना।।

कैसे समझाऊं सबको मैं, वो तो थी बहती  सरिता सी
मेरी पहली कविता जैसी....।।

बहती सरिता थी वो मिलने को अपने सागर से प्यासी
कैसे मिलती मुझसे जिसका जीवन बन बैठा बनवासी
कभी नहीं कह पाया उससे अपने मन की व्यथा कथा को
मेरी तृष्णा आजीवन अब सदा रहेगी प्यासी प्यासी।।
यूं  ही जीवन की इच्छाएं,शब्दों  में लिक्खी कविता सी।।
मेरी पहली कविता जैसी....।।

सर्वाधिकार सुरक्षित
मनोज नौटियाल

शुक्रवार, 3 जनवरी 2025

चंडी ध्वज स्तोत्रम।

चंडी ध्वज स्तोत्रम्   सही दिशा# ब्रह्मराक्षस
नित्य प्रति इसका पाठ करै और अपने जीवन मै परिवर्तन देखै #follower  #friends 
पहले जल हाथ मै लै और यह पढे 
ॐ अस्य श्री चंडी ध्वज स्तोत्र मन्त्रस्य मार कंडेय रिषि अनुष्टुप छंदः श्रां बीजं श्रीं शक्ति श्रूं कीलकं मम बान्छताथॅ सिद्यरथे जपे बिनियोगः 
ऊ श्रीं नमो जगत प्रतिष्ठायै दैब्यै भूत्यै नमो नमः 
परमानंद रूपिन्यै नित्यायै सततं नमः 
नमस्तेस्तु महा देबी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं दे हि मे सदा ।
रक्ष मां शरन्ये देवि धन धान्य प्रदायनी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा ।
नमस्तेस्तु महाकाली पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा ।
नमस्तेस्तु महा लछमी  पर ब्रम्ह स्वरूपणी  
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा ।
नमो महा सरस्वती देवी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो ब्राम्ही नमस्तेस्तु  पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो माहेश्वरी देवी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमस्तेस्तु च कोमारी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमस्ते बैष्णबी देबी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमस्तेस्तु च बाराही पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नारसिंही नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो नमस्ते इंद्राणी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो नमस्ते चामुंडे पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो नमस्ते नन्दायै पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
रक्तदंते नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमस्तेस्तु महा दुर्गे पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
शाकंभरी नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
शिव दूती नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमस्ते भ्रामरी देवि पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
नमो नवग्रह रूपे पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नव कूट महादेवी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
स्वणॅ पूरणे नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
श्री सुन्दरी नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो भगवति देवि पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
दिब्य योगिनी नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमस्तेस्तु महा देबी पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
नमो नमस्ते सावित्री पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा  
जय लक्ष्मी नमस्तेस्तु  पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
मोक्ष लक्ष्मी  नमस्तेस्तु पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
रक्ष माम शरन्ये देवि पर ब्रम्ह स्वरूपणी 
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा 
चंडी ध्वज मिदं स्तोत्रम् सरब काम फल प्रदं 
राजते सरब जन्तुनां वशीकरण साधनं ।।

इस चंडी ध्वज स्तोत्र को पाठ करने से सभी कामनाये सफल हो जाती है अधिक कहने की जरूरत नही है यह स्तोत्र स्वयं बोल रहा है राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा  केवल माता के सामने एक दीपक जलायै  पाठ नित्य करै घर पर चंडी ध्वज लगायें  मै जादा नही कहूँ गा आप स्वयं करके देखै 41दिन लगातार नियम से करै इतने मै आपको समझ आ जायेगा परिवर्तन  सभी प्रकार से लेकिन नियम से रोज करना है  
कृपया 41 दिन बाद मुझसे जरूर बताये अभी तक मेरा अनुभव  था आपका भी तो पता लगे धन्यवाद 

जय माँ राज राजेश्वरी  ।।
राज्यं देही धनं देही साम्राज्यं देहि मे सदा

बुधवार, 1 जनवरी 2025

श्री मंगल चंडिका स्तोत्रम

श्रीमंगल चंडिका स्त्रोत के लाभ
इस स्तोत्र का पाठ आप मंगलवार दिन आरंभ करें साथ ही भगवा
श्रीमंगल चंडिका स्त्रोत के लाभ
इस स्तोत्र का पाठ आप मंगलवार दिन आरंभ करें साथ ही भगवान शिव का पंचाक्षरी का एक माला जप करने से अधिक लाभ मिलेगा अत्यंत चमत्कारिक है यह स्तोत्र अवश्य लाभ लें
श्री मंगल चंडिका स्तोत्रम् का वर्णन ब्रह्मवार्ता पुराण में देखने को मिल जायेगा ! श्री मंगल चंडिका स्तोत्रम् पूरी तरह संस्कृत भाषा में लिखा हुआ हैं ! श्री मंगल चंडिका स्तोत्रम् का जाप करने से उस व्यक्ति की सभी इच्छाये पूरी हो जाती हैं ! चंडीका देवी महात्म्य की सर्वोच्च देवी मानी जाती है दुर्गा सप्तशती में चंडीका देवी को चामुंडा या माँ दुर्गा कहा गया हैं ! चंडीका देवी महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती का एक संयोजन रूप हैं ! श्री मंगल चंडिका स्तोत्रम् का व्यक्ति नियमित रूप से जाप करता हैं उसे धन, व्यापार, गृह-कलेश आदि समस्या से परेशानी नही आती हैं ! जिस भी जातक का विवाह में परेशानी आ रही हो तो उसे श्री मंगल चंडिका स्तोत्रम् का नियमित जाप करने से शादी में आ रही परेशानी दूर हो जाती हैं ,
मंगल दोष के कुछ प्रभावी एवं लाभकारी उपाय..
मंगल दोष की वजह से विवाह में देरी हो तो ये उपाय जरूर करने चाहिए। माना जाता है कि इन उपायों को करने से विवाह में आ रही बाधाएं जल्द दूर होती हैं और शीघ्र विवाह होता है।
1 जिन जातकों की जन्म कुंडली के 1,4,7 और 12 वें भाव में मंगल होता है, उन्हें मांगलिक दोष होता है। इस दोष के कारण जातक को कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है जैसे उनके भूमि से संबंधित कार्यो में बाधा आती है। विवाह में विलंब होता है। ऋण से मुक्ति नहीं मिलती, वास्तुदोष उत्पन्न हो सकता है
2 अगर किसी युवती के विवाह में मंगल की वजह से बाधा आ रही है तो शुक्ल पक्ष के मंगलवार को भगवान राम-सीता व हनुमानजी के चित्र की स्थापना करें और दीपक जलाकर सुंदरकांड का पाठ करें।
3 बंदरों व कुत्तों को गुड व आटे से बनी मीठी रोटी खिलाएं
4 मंगल चन्द्रिका स्तोत्र का पाठ करना भी लाभ देता है
5 माँ मंगला गौरी की आराधना से भी मंगल दोष दूर होता है
6 कार्तिकेय जी की पूजा से भी मंगल दोष के दुशप्रभाव में लाभ मिलता है
7 मंगलवार को बताशे व गुड की रेवड़ियाँ बहते जल में प्रवाहित करें
8 आटे की लोई में गुड़ रखकर गाय को खिला दें
9 मंगली कन्यायें गौरी पूजन तथा श्रीमद्भागवत के 18 वें अध्याय के नवें श्लोक का जप अवश्य करें
10 मांगलिक वर अथवा कन्या को अपनी विवाह बाधा को दूर करने के लिए मंगल यंत्र की नियमित पूजा अर्चना करनी चाहिए।
11 मंगल दोष द्वारा यदि कन्या के विवाह में विलम्ब होता हो तो कन्या को शयनकाल में सर के नीचे हल्दी की गाठ रखकर सोना चाहिए और नियमित सोलह गुरूवार पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाना चाहिए
12 मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से व हनुमान जी को सिन्दूर एवं चमेली का तेल अर्पित करने से मंगल दोष शांत होता है
13 महामृत्युजय मंत्र का जप हर प्रकार की बाधा का नाश करने वाला होता है, महामृत्युजय मंत्र का जप करा कर मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक व दांपत्य जीवन में मंगल का कुप्रभाव दूर होता है
14 यदि कन्या मांगलिक है तो मांगलिक दोष को प्रभावहीन करने के लिए विवाह से ठीक पूर्व कन्या का विवाह शास्त्रीय विधि द्वारा प्राण प्रतिष्ठित श्री विष्णु प्रतिमा से करे, तत्पश्चात विवाह करे
15 यदि वर मांगलिक हो तो विवाह से ठीक पूर्व वर का विवाह तुलसी के पौधे के साथ या जल भरे घट (घड़ा) अर्थात कुम्भ से करवाएं।
16 यदि मंगली दंपत्ति विवाहोपरांत लालवस्त्र धारण कर तांबे के पात्र में चावल भरकर एक रक्त पुष्प एवं एक रुपया पात्र पर रखकर पास के किसी भी हनुमान मन्दिर में रख आये तो मंगल के अधिपति देवता श्री हनुमान जी की कृपा से उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखी बना रहता है
मांगलिक-दोष हेतु मंगल के इन 21 नाम नित्य पाठ करें
1. ऊँ मंगलाय नम:
2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
3. ऊँ ऋण हर्वे नम:
4. ऊँ धनदाय नम:
5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम:
6. ऊँ महाकाय नम:
7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम:
8. ऊँ लोहिताय नम:
9. ऊँ लोहितगाय नम:
10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:
11. ऊँ धरात्मजाय नम:
12. ऊँ कुजाय नम:
13. ऊँ रक्ताय नम:
14. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
15. ऊँ भूमिदाय नम:
16. ऊँ अंगारकाय नम:
17. ऊँ यमाय नम:
18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम:
19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम:
20. ऊँ प्रहर्त्रे नम:
21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम:
अथश्री मंगलचंडिकास्तोत्रम् .
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवी मङ्गलचण्डिके I
ऐं क्रूं फट् स्वाहेत्येवं चाप्येकविन्शाक्षरो मनुः II
पूज्यः कल्पतरुश्चैव भक्तानां सर्वकामदः I
दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् II
मन्त्रसिद्धिर्भवेद् यस्य स विष्णुः सर्वकामदः I
ध्यानं च श्रूयतां ब्रह्मन् वेदोक्तं सर्व सम्मतम् II
देवीं षोडशवर्षीयां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् I
सर्वरूपगुणाढ्यां च कोमलाङ्गीं मनोहराम् II
श्वेतचम्पकवर्णाभां चन्द्रकोटिसमप्रभाम् I
वन्हिशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् II
बिभ्रतीं कबरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् I
बिम्बोष्टिं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् II
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोल्पललोचनाम् I
जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसंपदाम् II
संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे II
देव्याश्च ध्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने I
प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः II
शंकर उवाच रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मङ्गलचण्डिके I
हारिके विपदां राशेर्हर्षमङ्गलकारिके II
हर्षमङ्गलदक्षे च हर्षमङ्गलचण्डिके I
शुभे मङ्गलदक्षे च शुभमङ्गलचण्डिके II
मङ्गले मङ्गलार्हे च सर्व मङ्गलमङ्गले I
सतां मन्गलदे देवि सर्वेषां मन्गलालये II
पूज्या मङ्गलवारे च मङ्गलाभीष्टदैवते I
पूज्ये मङ्गलभूपस्य मनुवंशस्य संततम् II
मङ्गलाधिष्टातृदेवि मङ्गलानां च मङ्गले I
संसार मङ्गलाधारे मोक्षमङ्गलदायिनि II
सारे च मङ्गलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् I
प्रतिमङ्गलवारे च पूज्ये च मङ्गलप्रदे II
स्तोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मङ्गलचण्डिकाम् I
प्रतिमङ्गलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः II
देव्याश्च मङ्गलस्तोत्रं यः श्रुणोति समाहितः I
तन्मङ्गलं भवेच्छश्वन्न भवेत् तदमङ्गलम् II
II इति श्री ब्रह्मवैवर्ते मङ्गलचण्डिका स्तोत्रं संपूर्णम् II
श्री मङ्गलचण्डिका स्तोत्र (हिंदी अनुवाद)
' ॐ हृीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके ऐं क्रूं फट् स्वाहा ॥ '
इक्कीस अक्षरका यह मन्त्र सुपूजित होनेपर भक्तोंकी संपूर्ण कामना प्रदान करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरुप है ।
ब्रह्मन् ! अब ध्यान सुनो । सर्वसम्मत ध्यान वेदप्रणित है ।
" सुस्थिर यौवना भगवती मङ्गलचण्डिका सदा सोलह
वर्षकी ही जान पडती हैं । ये सम्पूर्ण रुप-गुणसे सम्पन्न,
कोमलाङ्गी एवं मनोहारिणी हैं । श्र्वेत चम्पाके समान इनका गौरवर्ण तथा करोडों चन्द्रमाओंके तुल्य इनकी
मनोहर कान्ति हैं । वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये
रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं । मल्लिका पुष्पोंसे समलंकृत केशपाश धारण करती हैं । बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त पक्तिं तथा शरत्कालके प्रफुल्ल कमलकी भाँति शोभायमान मुखवाली मङ्गलचण्डिकाके प्रसन्न अरविंद जैसे वदनपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही हैं । इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले
हुए नीलकमलके समान मनोहर जान पडते हैं । सबको
सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करनेवाली ये जगदम्बा घोर संसार
सागरसे उबारनेमें जहाजका काम करती हैं । मैं सदा इनका भजन करता हूँ । "
मुने ! यह तो भगवती मङ्गलचण्डिकाका ध्यान हुआ ।
ऐसे ही स्तवन भी है, सुनो !
महादेवजीने कहा
" जगन्माता भगवती मङ्गलचण्डिके ! आप सम्पूर्ण विपत्तियोंका विध्वंस करनेवाली हो एवं हर्ष तथा मङ्गल
प्रदान करनेको सदा प्रस्तुत रहती हो । मेरी रक्षा करो, रक्षा करो । खुले हाथ हर्ष और मङ्गल देनेवाली हर्ष मङ्गलचण्डिके ! आप शुभा, मङ्गलदक्षा, शुभमङ्गलचण्डिका, मङ्गला, मङ्गलार्हा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला कहलाती हो ।
देवि ! साधुपुरुषोंको मङ्गल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण हैं । तुम सबके लिये मङ्गलका आश्रय हो । देवि ! तुम मङ्गलग्रहकी इष्टदेवी हो । मङ्गलके दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिये । मनुवंशमें उत्पन्न राजा मङ्गलकी पूजनीया देवी यहो । मङ्गलाधिष्ठात्री देवी !
तुम मङ्गलोंके लिये भी मङ्गल हो । जगत्के समस्त
मङ्गल तुमपर आश्रित हैं । तुम सबको मोक्षमय मङ्गल प्रदान करती हो । मङ्गलको सुपूजित होनेपर मङ्गलमय
सुख प्रदान करनेवाली देवि ! तुम संसारकी सारभूता मङ्गलाधारा तथा समस्त कर्मोंसे परे हो । "
इस स्तोत्रसे स्तुति करके भगवान् शंकरने देवी मङ्गचण्डिकाकी उपासना की । वे प्रति मङ्गलवारको उनका पूजन करते चले जाते हैं । यों ये भगवती सर्वमङ्गला सर्वप्रथम भगवान् शंकरसे पूजित हुई ।
उनके दूसरे उपासक मङ्गल ग्रह हैं । तीसरी बार राजा
मङ्गलने तथा चौथी बार मङ्गलके दिन कुछ सुन्दरी स्त्रियोंने इन देवीकी पूजा की । पाँचवीं बार मङ्गलकी कामना रखनेवाले बहुसंख्यक मनुष्योंने मङ्गलचण्डिकाका पूजन किया । फिर तो विश्वेश शंकरसे सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्र्वमें सदा पूजित होने
लगीं । मुने ! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव सभी
सर्वत्र इन परमेश्र्वरीकी पूजा करने लगे ।
फलश्रुति :
जो पुरुष मनको एकाग्र करके भगवती मङ्गलचण्डिकाके इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे सदा मङ्गल प्राप्त होता है । अमङ्गल उसके पास नहीं आ
सकता । उसके पुत्र और पौत्रोंमें वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मङ्गलही दृष्टिगोचर होता है ।
यह अनुवाद गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराणमे किये गये हिंदी अनुवादपर आधारित है तथा उनके प्रति नम्रतापूर्वक कृतज्ञता प्रगतकरते हुए साधकों के लिये सादर किया गया है ।

गुरुवार, 26 दिसंबर 2024

दरिद्र्य दहन शिव स्तोत्रम

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय
कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय ।
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥२॥

भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय
उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय ।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥३॥

चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय ।
मंझीरपादयुगलाय जटाधराय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥४॥

पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय
हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय ।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥५॥

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय
कालान्तकाय कमलासनपूजिताय ।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥६॥

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय ।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥७॥

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय
गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय
दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥८॥

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं ।
सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् ।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥
॥ इति वसिष्ठ विरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

शुक्रवार, 15 नवंबर 2024

स्तोत्रम और मंत्र में अंतर

🔴🔵स्तोत्रम और मंत्र में क्या अंतर है?🔵🔴
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

स्त्रोत और मंत्र देवताओं को प्रसन्न करने के शक्तिशाली माध्यम हैं। आज हम जानेंगे की मन्त्र और स्त्रोत में क्या अंतर होता है। किसी भी देवता की पूजा करने से पहले उससे सबंधित मन्त्रों को गुरु की सहायता से सिद्ध किया जाना चाहिए।

*स्त्रोत*

किसी भी देवी या देवता का गुणगान और महिमा का वर्णन किया जाता है। स्त्रोत का जाप करने से अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है और दिव्य शब्दों के चयन से हम उस देवता को प्राप्त कर लेते हैं और इसे किसी भी राग में गाया जा सकता है। स्त्रोत के शब्दों का चयन ही महत्वपूर्ण होता है और ये गीतात्मक होता है।

*मन्त्र*

मन्त्र को केवल शब्दों का समूह समझना उनके प्रभाव को कम करके आंकना है। मन्त्र तो शक्तिशाली लयबद्ध शब्दों की तरंगे हैं जो बहुत ही चमत्कारिक रूप से कार्य करती हैं। ये तरंगे भटकते हुए मन को केंद्र बिंदु में रखती हैं। शब्दों का संयोजन भी साधारण नहीं होता है, इन्हे ऋषि मुनियों के द्वारा वर्षों की साधना के बाद लिखा गया है। मन्त्रों के जाप से आस पास का वातावरण शांत और भक्तिमय हो जाता है जो सकारात्मक ऊर्जा को एकत्रिक करके मन को शांत करता है। मन के शांत होते ही आधी से ज्यादा समस्याएं स्वतः ही शांत हो जाती हैं। मंत्र किसी देवी और देवता का ख़ास मन्त्र होता है जिसे एक छंद में रखा जाता है। वैदिक ऋचाओं को भी मन्त्र कहा जाता है। इसे नित्य जाप करने से वो चैतन्य हो जाता है। मंत्र का लगातार जाप किया जाना चाहिए। सुसुप्त शक्तियों को जगाने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं। मंत्र एक विशेष लय में होती है जिसे गुरु के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। जो हमारे मन में समाहित हो जाए वो मंत्र है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही ओमकार की उत्पत्ति हुयी है। इनकी महिमा का वर्णन श्री शिव ने किया है और इनमे ही सारे नाद छुपे हुए हैं। मन्त्र अपने इष्ट को याद करना और उनके प्रति समर्पण दिखाना है। मंत्र और स्त्रोत में अंतर है की स्त्रोत को गाया जाता है जबकि मन्त्र को एक पूर्व निश्चित लय में जपा जाता है।

*बीज मंत्र क्या होता है*

देवी देवताओं के मूल मंत्र को बीज मन्त्र कहते हैं। सभी देवी देवताओं के बीज मन्त्र हैं। समस्त वैदिक मन्त्रों का सार बीज मन्त्रों को माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार सबसे प्रधान बीज मन्त्र ॐ को माना गया है। ॐ को अन्य मन्त्रों के साथ प्रयोग किया जाता है क्यों की यह अन्य मन्त्रों को उत्प्रेरित कर देता है। बीज मंत्रो से देव जल्दी प्रशन्न होते हैं और अपने भक्तों पर शीघ्र दया करते हैं। जीवन में कैसी भी परेशानी हो यथा आर्थिक, सामजिक या सेहत से जुडी हुयी कोई समस्या ही क्यों ना हो बीज मन्त्रों के जाप से सभी संकट दूर होते हैं।

स्तूयतेऽनेनेति स्तोत्रम्, स्तु+ष्ट्रन्, स्तुतिः, गुण कर्मादिभिः प्रशंसने इत्यमरः। जिससे गुण,कर्म आदि कहे जाएं वे स्तोत्र या स्तुति कहे जाते हैं, ऐसा अमरकोष में कहा गया है।

स्तोत्रं कस्य न तुष्टये। स्तुति या गुण यश के गान से, वर्णन करने से किसे संतुष्टि या प्रसन्नता नहीं होती। स्तुति देवता(देवी, देवता)के गुण, यश आदि के वर्णन को कहते हैं। इसमें भक्त अपने ईष्ट देवता से उनके गुणों का वर्णन करते हुए अपनी निस्सहायता एवं उनकी दयालुता प्रदर्शित करते हुए उनके कृपा के आकांक्षी होते हैं।

मन्त्र्यते गुप्तं परिभाष्यते इति मत्रि गुप्तभाषणे +घञ् ।यद्वा,मन्त्रयते गुप्तं भाषते इति मत्रि गुप्तभाषणे अच्। अमरकोष के इस व्युत्पत्ति परक व्याख्या से यह स्पष्ट है कि मन्त्र का अर्थ गुप्त या रहस्यपूर्ण कथन या बात से है। लोगों में आपस में कहा भी जाता है कि, क्या मन्त्रणा हो रही है।अर्थात् क्या गुप्त वार्ता हो रही है।

मन्त्र देवता की साधना के माध्यम हैं। शास्त्र में कहा गया है, मन्त्राधीनो देवता। मन्त्र रहस्यात्मक वर्ण समूह होते हैं। यद्यपि उन वर्णों या शब्दों के समूह के अर्थ होते हैं परन्तु उनके अर्थ गूढ होते हैं एवं उनके अर्थों से अधिक महत्व उनकी साधना में निहित होते हैं। मन्त्रों के अर्थ बेमेल या अनगढ़ अथवा आश्चर्य जनक भी हो सकते हैं जैसे शाबर मन्त्र के होते हैं। 

संत तुलसीदास ने रामचरित मानस में कहा है, 

कलि बिलोकि, जग हित हर गिरिजा। 
साबर मन्त्र जाल जिन्ह सिरिजा।।
अनमिल आखर अरथ न जापू। 
प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।। 

अर्थात् शिव पार्वती ने कलि काल को देख कर संसार के कल्याण के लिए शाबर मन्त्र के समूहों की रचना की, जिनके अक्षर बेमेल हैं,उनके अर्थ नहीं होते( या ठीक नहीं होते), किन्तु भगवान् शिव के प्रताप से उनके प्रभाव होते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है, देवाधीनो जगत् सर्वं, मन्त्राधीनो देवता। अर्थात् देवता के अधीन सम्पूर्ण संसार हैं तथा मन्त्रों के अधीन देवता हैं।

स्तोत्र और मन्त्र में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि मन्त्र बिना गुरु के दिए फलदायी नहीं होते या अनिष्ट फलदायी भी हो सकते हैं किन्तु स्तुति तो स्वयं पुस्तकों से भी किए जाते हैं एवं उनका हमेशा शुभ फल ही होता है।

मन्त्रों को देवता का शरीर रूप कहा गया है। इसीलिए उनके प्रति आवश्यक सावधानी भी बरतनी चाहिए। वेदों के मन्त्रों का यदि अक्षर या स्वर का गलत उच्चारण हो तो उनसे अनिष्ट होता है। जैसा की पाणिनीय शिक्षा में कहा गया है, हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानो हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्।। स्तोत्र और मन्त्र में इन सभी अन्तर के कथन के बाद यह कहना भी आवश्यक है कि इनमें समानता भी है जैसे दुर्गा शप्तशती के श्लोक स्वतः सिद्ध हैं,रामचरितमानस की चौपाइयाँ या दोहे भी स्वतः सिद्ध हैं। ये मन्त्र रूप ही हो चुके हैं। रामचरितमानस में वर्णित, जनकसुता जगजननि जानकी अतिशय प्रिय करुणा निधान की।ताके युगपदकमल मनावहुं जासु कृपा निर्मल मति पाबहुं।। यह गायत्री मंत्र का ही रूप है।

इसी प्रकार, मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्।इस उक्ति से यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण वेद मन्त्र एवं ब्राह्मण (यहां ब्राह्मण का अर्थ यज्ञ है) यज्ञपरक गद्य का सम्मिलित रूप है। अब मन्त्र के विषय में यास्क के निरुक्त का निर्वचन देखें, मननात् त्राणनात् च मन्त्रः अर्थात् मनन् से विचारण से जो त्राण दिलावे, रक्षा करे वह मन्त्र है। 

भगवान् वेद व्यास ने कहा है, जपात्सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्नसंशयः। अर्थात् मन्त्र के सतत् जाप से सिद्धि मिलती है इसमें कोई संदेह नहीं। इष्ट देव का नाम भी मंत्र ही है। अपने इष्ट देव के मन्त्र का जप एवं कीर्तन, मन को एकाग्रचित्त करने वाला एवं कल्याण कारक होता है। 

*स्त्रोत और मंत्र जाप के लाभ*

चाहे मन्त्र हो या फिर स्त्रोत इनके जाप से देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों में मन्त्रों की महिमा का विस्तार से वर्णन है। श्रष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है जो मन्त्रों से प्राप्त ना किया जा सके, आवश्यक है साधक के द्वारा सही जाप विधि और कल्याण की भावना। बीज मंत्रों के जाप से विशेष फायदे होते हैं। यदि किसी मंत्र के बीज मंत्र का जाप किया जाय तो इसका प्रभाव और अत्यधिक बढ़ जाता है। वैज्ञानिक स्तर पर भी इसे परखा गया है। मंत्र जाप से छुपी हुयी शक्तियों का संचार होता है। मस्तिष्क के विशेष भाग सक्रीय होते है। मन्त्र जाप इतना प्रभावशाली है कि इससे भाग्य की रेखाओं को भी बदला जा सकता है। यदि बीज मन्त्रों को समझ कर इनका जाप निष्ठां से किया जाय तो असाध्य रोगो से छुटकारा मिलता है। मन्त्रों के सम्बन्ध में ज्ञानी लोगों की मान्यता है की यदि सही विधि से इनका जाप किया जाय तो बिना किसी औषधि की असाध्य रोग भी दूर हो सकते हैं। विशेषज्ञ और गुरु की राय से राशि के अनुसार मन्त्रों के जाप का लाभ और अधिक बढ़ जाता है।

विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए पृथक से मन्त्र हैं जिनके जाप से निश्चित ही लाभ मिलता है। मंत्र दो अक्षरों से मिलकर बना है मन और त्र। तो इसका शाब्दिक अर्थ हुआ की मन से बुरे विचारों को निकाल कर शुभ विचारों को मन में भरना। जब मन में ईश्वर के सम्बंधित अच्छे विचारों का उदय होता है तो रोग और नकारात्मकता सम्बन्धी विचार दूर होते चले जाते है। वेदों का प्रत्येक श्लोक एक मन्त्र ही है। मन्त्र के जाप से एक तरंग का निर्माण होता है जो की सम्पूर्ण वायुमंडल में व्याप्त हो जाता है और छिपी हुयी शक्तियों को जाग्रत कर लाभ प्रदान करता है।

विभिन्न मन्त्र और उनके लाभ :

ॐ गं गणपतये नमः : इस मंत्र के जाप से व्यापार लाभ, संतान प्राप्ति, विवाह आदि में लाभ प्राप्त होता है।

ॐ हृीं नमः : इस मन्त्र के जाप से धन प्राप्ति होती है।

ॐ नमः शिवाय : यह दिव्य मन्त्र जाप से शारीरिक और मानसिक कष्टों का निवारण होता है।

ॐ शांति प्रशांति सर्व क्रोधोपशमनि स्वाहा : इस मन्त्र के जाप से क्रोध शांत होता है।

ॐ हृीं श्रीं अर्ह नमः : इस मंत्र के जाप से सफलता प्राप्त होती है।

ॐ क्लिीं ॐ : इस मंत्र के जाप से रुके हुए कार्य सिद्ध होते हैं और बिगड़े काम बनते हैं।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय : इस मंत्र के जाप से आकस्मिक दुर्घटना से मुक्ति मिलती है।

ॐ हृीं हनुमते रुद्रात्म कायै हुं फटः : सामाजिक रुतबा बढ़ता है और पदोन्नति प्राप्त होती है।

ॐ हं पवन बंदनाय स्वाहा : भूत प्रेत और ऊपरी हवा से मुक्ति प्राप्त होती है।

ॐ भ्रां भ्रीं भौं सः राहवे नमः : परिवार में क्लेश दूर होता है और शांति बनी रहती है।

ॐ नम: शिवाय : इस मंत्र के जाप से आयु में वृद्धि होती है और शारीरिक रोग दोष दूर होते हैं।

ॐ महादेवाय नम: सामाजिक उन्नति और धन प्राप्ति के लिए यह मन्त्र उपयोगी है।

ॐ नम: शिवाय : इस मंत्र से पुत्र की प्राप्ति होती है।

ॐ नमो भगवते रुद्राय : मान सम्मान की प्राप्ति होती है और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है।
ॐ नमो भगवते रुद्राय : मोक्ष प्राप्ति हेतु।

ॐ महादेवाय नम: घर और वाहन की प्राप्ति हेतु।

ॐ शंकराय नम: दरिद्रता, रोग, भय, बन्धन, क्लेश नाश के लिए इस मंत्र का जाप करें।

संस्कृत साहित्य में किसी देवी-देवता की स्तुति में लिखे गये काव्य को स्तोत्र कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में यह स्तोत्रकाव्य के अन्तर्गत आता है। महाकवि कालिदास के अनुसार 'स्तोत्रं कस्य न तुष्टये' अर्थात् विश्व में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो स्तुति से प्रसन्न न हो जाता हो। इसलिये विभिन्न देवताओं को प्रसन्न करने हेतु वेदों, पुराणों तथा काव्यों में सर्वत्र सूक्त तथा स्तोत्र भरे पड़े हैं। अनेक भक्तों द्वारा अपने इष्टदेव की आराधना हेतु स्तोत्र रचे गये हैं। विभिन्न स्तोत्रों का संग्रह स्तोत्ररत्नावली के नाम से उपलब्ध हैं।

मंत्र की उत्पत्ति विश्वास से और सतत मनन से हुई है। आदि काल में मंत्र और धर्म में बड़ा संबंध था। प्रार्थना को एक प्रकार का मंत्र माना जाता था। मनुष्य का ऐसा विश्वास था कि प्रार्थना के उच्चारण से कार्यसिद्धि हो सकती है। इसलिये बहुत से लोग प्रार्थना को मंत्र समझते थे।

हिन्दू श्रुति ग्रंथों के पारंपरिक रूप मंत्र कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ विचार या चिंतन होता है। मंत्रणा और मंत्री इसी मूल से बने शब्द हैं। मंत्र भी एक प्रकार की वाणी है, परन्तु साधारण वाक्यों के समान वे हमको बंधन में नहीं डालते, बल्कि बंधन से मुक्त करते हैं।
मंत्र (मंत्र) - एक पवित्र उच्चारण है, शब्दों का एक शब्दांश मूल है जिसमें माना जाता है कि मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक शक्तियां हैं।

उदाहरण - गायत्री मंत्र, ओम, शांति मंत्र

सूक्तम (सूक्त) - प्रत्येक वेद को मंडला में विभाजित किया जाता है जिसमें विभिन्न अनुष्ठानों के लिए सूक्त नामक भजन होते हैं। बदले में सूक्त में व्यक्तिगत नारे शामिल हैं (कविता)

उदाहरण - नासदीय सूक्त, पुरुष सूक्त, श्री सूक्त

स्तोत्र (स्तोत्र) - ये भगवान की स्तुति करने के लिए लिखे गए भजन हैं। सूक्तम और स्तोत्र दोनों का एक ही उद्देश्य है कि भगवान से प्रार्थना करें।

उदाहरण - पंचाक्षरा स्तोत्र, राम रक्षा स्तोत्र, सरस्वती स्तोत्र

शोलका (श्लोक) - पद्य की क्रमिक पंक्तियों की एक जोड़ी, आमतौर पर तुकबंदी और एक ही लंबाई की। अधिकांश हिंदू धर्मग्रंथ स्लोका के रूप में लिखे गए हैं। महाभारत, रामायण और उपनिषद

स्तुति (स्तुति) - भगवान को अर्पित की जाने वाली कोई भी प्रार्थना, मंत्र, सूक्तम, स्तोत्र, आरती, भजन का पाठ करके की जा सकती है।

उदाहरण - लक्ष्मी स्तुति

मंत्र वह ध्वनि है जो अक्षरों एवं शब्दों के समूह से बनता है। मन्त्र ध्वनि प्रधान हैं। मन्त्र ध्वनि के तरंगों से संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त नाद ऊर्जा से एकाकार होकर ध्यान की उच्चतम अवस्था में साधक का आध्यात्मिक व्यक्तित्व पूरी तरह से ब्रह्मांड रचयिता प्रभु के साथ एकाकार हो जाता है, जो सारे ज्ञान का स्रोत है। मंत्रों के द्वारा साधक दिव्य ऊर्जा के स्रोत से जुड़कर अपने और सभी के कष्टों का निवारण कर सकने में समर्थ हो जाता है। मन्त्र की सिद्धि और शक्ति उसके उच्चारण के लय, तीव्रता, आवृत्ति, उच्चारण अवधि तथा शुद्धता और साधक के शुचिता पर आधारित होता है।

दिव्यस्वरूपों की स्तुति को स्तोत्र कहते हैं। किसी देवता की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये उनकी स्तुति में स्तोत्र का पाठ किया जाता है। विभिन्न देवताओं के अलग अलग स्तुतियाँ है जो ऋचाओं, सूक्तों में वेदों, पुराणों एवं ग्रन्थों में वर्णित हैं।

धन्यवाद एवं साधुवाद। शुभं भूयात्।

#आर्यवर्त #अघोर

सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

🌹🌹ऋग्वेदोक्त श्री सूक्त हिंदी भावार्थ सहित 🌹🌹

🌹🌹ऋग्वेदोक्त श्री सूक्त हिंदी भावार्थ सहित 🌹🌹

श्री सूक्त या श्री सूक्तम महालक्ष्मी की उपासना के लिए ऋग्वेद में वर्णित एक स्तोत्र है। श्री सूक्त का पाठ महालक्ष्मी की प्रसन्नता एवं उनकी कृपा प्राप्त कराने वाला है साथ ही व्यापार में वृद्धि, ऋण से मुक्ति और धन प्राप्ति के लिए भी इसका पाठ तथा अनुष्ठान किया जाता है।

श्रद्धा एवं विश्वास के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने वाले व्यक्ति पर माता लक्ष्मी कृपा करती हैं। लक्ष्मी जी की कृपा होने पर व्यक्ति सिर्फ धन और ऐश्वर्य ही नहीं बल्कि यश एवं कीर्ति भी प्राप्त करता है।

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥1॥

अर्थ – हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! सुवर्ण के रंग वाली, सोने और चाँदी के हार पहनने वाली, चन्द्रमा के समान प्रसन्नकांति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिये आवाहन करो।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥2॥

अर्थ – अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवी को, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं सोना, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि को प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो।

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥3॥

अर्थ – जिन देवी के आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं तथा जो हस्तिनाद को सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवी का मैं आवाहन करता हूँ; लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां
ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां
तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥4॥

अर्थ – जो साक्षात ब्रह्मरूपा, मंद-मंद मुसकराने वाली, सोने के आवरण से आवृत, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, अपने भक्तों पर अनुग्रह करनेवाली, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं
श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये
अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥5॥

अर्थ – मैं चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों के द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता लक्ष्मीदेवी की शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो
वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु
या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥6॥

अर्थ – हे सूर्य के समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल हमारे बाहरी और भीतरी दारिद्र्य को दूर करें।

उपैतु मां देवसखः
कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्
कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥7॥

अर्थ – देवि ! देवसखा कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों अर्थात मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥8॥

अर्थ – लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन और क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि ! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्र्य और अमंगल को दूर करो।

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥9॥

अर्थ – जो दुराधर्षा और नित्यपुष्टा हैं तथा गोबर से ( पशुओं से ) युक्त गन्धगुणवती हैं। पृथ्वी ही जिनका स्वरुप है, सब भूतों की स्वामिनी उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ अपने घर में आवाहन करता हूँ।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥10॥

अर्थ – मन की कामनाओं और संकल्प की सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हो। गौ आदि पशु एवं विभिन्न प्रकार के अन्न भोग्य पदार्थों के रूप में तथा यश के रूप में श्रीदेवी हमारे यहाँ आगमन करें।

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥11॥

अर्थ – लक्ष्मी के पुत्र कर्दम की हम संतान हैं। कर्दम ऋषि ! आप हमारे यहाँ उत्पन्न हों तथा पद्मों की माला धारण करनेवाली माता लक्ष्मीदेवी को हमारे कुल में स्थापित करें।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥12॥

अर्थ – जल स्निग्ध पदार्थों की सृष्टि करे। लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! आप भी मेरे घर में वास करें और माता लक्ष्मीदेवी का मेरे कुल में निवास करायें।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥13॥

अर्थ – अग्ने ! आर्द्रस्वभावा, कमलहस्ता, पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मों की माला धारण करनेवाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे यहाँ आवाहन करें।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥14॥

अर्थ – अग्ने ! जो दुष्टों का निग्रह करनेवाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करनेवाली यष्टिरूपा, सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥15॥

अर्थ – अग्ने ! कभी नष्ट न होनेवाली उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें, जिनके आगमन से बहुत-सा धन, गौएँ, दासियाँ, अश्व और पुत्रादि को हम प्राप्त करें।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥16॥

अर्थ – जिसे लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्नि में घी की आहुतियाँ दे तथा इन पंद्रह ऋचाओं वाले श्री सूक्त का निरन्तर पाठ करे।

पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सं नि धत्स्व ॥17॥

अर्थ – कमल के समान मुखवाली ! कमलदल पर अपने चरणकमल रखनेवाली ! कमल में प्रीति रखनेवाली ! कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाली ! समग्र संसार के लिये प्रिय ! भगवान विष्णु के मन के अनुकूल आचरण करनेवाली ! आप अपने चरणकमल को मेरे हृदय में स्थापित करें।

पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षि पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥18॥

अर्थ – कमल के समान मुखमण्डल वाली ! कमल के समान ऊरुप्रदेश वाली ! कमल के समान नेत्रोंवाली ! कमल से आविर्भूत होनेवाली ! पद्माक्षि ! आप उसी प्रकार मेरा पालन करें, जिससे मुझे सुख प्राप्त हो।

अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥19॥

अर्थ – अश्वदायिनी, गोदायिनी, धनदायिनी, महाधनस्वरूपिणी हे देवि ! मेरे पास सदा धन रहे, आप मुझे सभी अभिलषित वस्तुएँ प्रदान करें।

पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥20॥

अर्थ – आप प्राणियों की माता हैं। मेरे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, हाथी, घोड़े, खच्चर तथा रथ को दीर्घ आयु से सम्पन्न करें।

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना ॥21॥

अर्थ – अग्नि, वायु, सूर्य, वसुगण, इन्द्र, बृहस्पति, वरुण तथा अश्विनी कुमार – ये सब वैभवस्वरुप हैं।

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥22॥

अर्थ – हे गरुड ! आप सोमपान करें। वृत्रासुर के विनाशक इन्द्र सोमपान करें। वे गरुड तथा इन्द्र धनवान सोमपान करने की इच्छा वाले के सोम को मुझ सोमपान की अभिलाषा वाले को प्रदान करें।

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्त्या श्रीसूक्तजापिनाम् ॥23॥

अर्थ – भक्तिपूर्वक श्री सूक्त का जप करनेवाले, पुण्यशाली लोगों को न क्रोध होता है, न ईर्ष्या होती है, न लोभ ग्रसित कर सकता है और न उनकी बुद्धि दूषित ही होती है।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्र सीद मह्यम् ॥24॥

अर्थ – कमलवासिनी, हाथ में कमल धारण करनेवाली, अत्यन्त धवल वस्त्र, गन्धानुलेप तथा पुष्पहार से सुशोभित होनेवाली, भगवान विष्णु की प्रिया लावण्यमयी तथा त्रिलोकी को ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली हे भगवति ! मुझपर प्रसन्न होइये।

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
लक्ष्मीं प्रियसखीं भूमिं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥25॥

अर्थ – भगवान विष्णु की भार्या, क्षमास्वरूपिणी, माधवी, माधवप्रिया, प्रियसखी, अच्युतवल्लभा, भूदेवी भगवती लक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ।

महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥26॥

अर्थ – हम विष्णु पत्नी महालक्ष्मी को जानते हैं तथा उनका ध्यान करते हैं। वे लक्ष्मीजी सन्मार्ग पर चलने के लिये हमें प्रेरणा प्रदान करें।

आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।
ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः ॥27॥

अर्थ – पूर्व कल्प में जो आनन्द, कर्दम, श्रीद और चिक्लीत नामक विख्यात चार ऋषि हुए थे। उसी नाम से दूसरे कल्प में भी वे ही सब लक्ष्मी के पुत्र हुए। बाद में उन्हीं पुत्रों से महालक्ष्मी अति प्रकाशमान शरीर वाली हुईं, उन्हीं महालक्ष्मी से देवता भी अनुगृहीत हुए।

ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥28॥

अर्थ – ऋण, रोग, दरिद्रता, पाप, क्षुधा, अपमृत्यु, भय, शोक तथा मानसिक ताप आदि – ये सभी मेरी बाधाएँ सदा के लिये नष्ट हो जाएँ।

श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥29॥

अर्थ – भगवती महालक्ष्मी मानव के लिये ओज, आयुष्य, आरोग्य, धन-धान्य, पशु, अनेक पुत्रों की प्राप्ति तथा सौ वर्ष के दीर्घ जीवन का विधान करें और मानव इनसे मण्डित होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करे।

॥ ऋग्वेद वर्णित श्री सूक्त सम्पूर्ण ॥

रविवार, 27 अक्टूबर 2024

राधा जी के 28 चमत्कारी नाम 🙏

  1. राधा,
  2. रासेश्वरी,
  3. रम्या,
  4. कृष्णमत्राधिदेवता,
  5. सर्वाद्या,
  6. सर्ववन्द्या,
  7. वृन्दावनविहारिणी,
  8. वृन्दाराधा,
  9. रमा,
  10. अशेषगोपीमण्डलपूजिता,
  11. सत्या,
  12. सत्यपरा,
  13. सत्यभामा,
  14. श्रीकृष्णवल्लभा,
  15. वृषभानुसुता,
  16. गोपी,
  17. मूल प्रकृति,
  18. ईश्वरी,
  19. गान्धर्वा,
  20. राधिका,
  21. रम्या,
  22. रुक्मिणी,
  23. परमेश्वरी,
  24. परात्परतरा,
  25. पूर्णा,
  26. पूर्णचन्द्रविमानना,
  27. भुक्ति-मुक्तिप्रदा और
  28. भवव्याधि-विनाशिनी।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

करवाचौथ

ख़ास कुछ तो आज करवा चौथ का त्यौहार होगा
चाँद तुझको आज छत पर चाँद का दीदार होगा ।

पूछ लेना तुम सभी नक्षत्र पिंडों की हदों से 
पूछ लेना आज अपने आसमाँ की सरहदों से 
चार वेदों की ऋचाओं से , पुराणों के पदों से 
पूछ लेना देवताओं की सुरा के मयकदों से 

तीन लोकों से अलौकिक , रूप औ श्रृंगार होगा 
चाँद तुझको आज छत पर चाँद का दीदार होगा ।।

सुर्ख मेहँदी नर्म हाथों में लगाईं दामिनी ने 
जुल्फ ये काली घटाओं सी सजाई यामिनी ने 
खनखनाती चूड़ियों की धुन बनाई  रागिनी ने
कामनाएं काम की , साकार की कामायनी ने 

आज छत पर कल्पनाओं का सकल संसार होगा 
चाँद तुझको आज छत पर चाँद का दीदार होगा ।।

प्रीत की इस रीत की हर छत गवाही आज देगी 
आस्था के थाल में , विश्वास की ज्योती जलेगी 
संग साजन के सजी दुल्हन बनी गोरी चलेगी 
देख कर बरात घर घर  , रात भी धीरे ढलेगी 

आज पावन प्रार्थनाओं का मधुर  गुंजार होगा 
चाँद तुझको आज छत पर चाँद का दीदार होगा ।।

मनोज नौटियाल , 19- 10- 2016

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

लक्ष्मी साबर साधना

कार्तिक महिने में भगवती लक्ष्मी की साधना जल्दी फल प्रदान करती है।लक्ष्मी शाबर मंत्र की नित्य दिन या रात्रि  में एक माला कमलबीज की माला से सफेद या पीले आसान पर बैठकर जप करें। 

ॐ विष्णु-प्रिया लक्ष्मी, शिव-प्रिया सती से प्रकट हुई कामाक्षा भगवती आदि-शक्ति, युगल मूर्ति अपार, दोनों की प्रीति अमर, जाने संसार। दुहाई कामाक्षा की। आय बढ़ा व्यय घटा। दया कर माई। ॐ नमः विष्णु-प्रियाय। ॐ नमः शिव-प्रियाय। ॐ नमः कामाक्षाय। ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा। 

विशेष:- देवी लक्ष्मी के चित्र या यंत्र को  अक्षत, गुलाब या कमल पुष्प नित्य चढ़ायें , दीपक गाय के घी का ही जलाएं। भोग दूध पेड़ा या खीर रखें।
जय महाकालकाली
पंडित मनोज नौटियाल 
सम्पर्क सूत्र - 9041032215