गुरुवार, 30 मार्च 2017

सरल साधना रहस्य -2

भौतिकवादी युग में आज तांत्रिक साधनाओं की भरमार हर कहीं देखने को मिल रही है ।
बाजार में तंत्र संबंधी हजारों पुस्तकें मिल जायेगी , सोशल नेटवर्क के जरिये भी आज विभिन्न प्रकार की साधना एवं मन्त्र , यंत्र , तंत्र प्रेषित किये जा रहे हैं  ।
लेकिन साधक और साधना के विषयक अधिकतर ज्ञान किसी ना किसी प्रकार से पूर्वाग्रह से पीड़ित मिलता है ।
अधिकतर लोगों ने आज बहुत सी साधनाएं अपने मन मुताबिक़ बना ली हैं , और स्वयं का सिक्का चलवाने के लिए ऐसे तथाकथित संत आज नये नये साधकों को प्रलोभन देकर , गुरुत्व का तमगा अपने माथे पर सजाने को व्याकुल रहते हैं ।
मित्रों , साधना का सरल अर्थ है जीवन को अथवा स्वयम को साध कर परमेश्वर को स्वयम में महसूस करना ।
नये साधकों के लिए कुछ अनुभव के आधार पर सरल सूत्र बता रहा हूँ । मुझे यकीन है कि ये सूत्र एवं विधियां आपको साधना की जमीन पर शशक्त योद्धा की तरह स्थापित करने में मदद करेगी ।
* साधना का सबसे प्रारम्भिक चरण है अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित एवं नियमबद्ध बनाइये ।  जो भी आप कार्य करते हैं वह रोज एक निश्चित टाइम टेबल पर करने की आदत डालिये । 24 घंटों के एक दिन को इस तरह बाँटिये कि जब भी जो कार्य आपने पहके दिन निर्धारित किया है वह कार्य रोज उसी समय पर करने की आदत डालिये ।
* सजग रहिये । अपने क्रियाकलापों एवं अपनी बुद्धि एवं मन की विचारधारा को सजगता से देखिये और देखिये कि कब आपको क्रोध आया , कब काम जागा , कब आपको अहंकार हुआ । याद रखिए कि हम जीव हैं और ये जो भी दुर्गुण हैं यह हमारी स्वाभाविक नियति है , इनसे बिचलित मत होइए बल्कि , धीरे धीरे सजगता से इनको पहचानिए , याद रखिए कि सजगता में वह शक्ति है जो आपके और हमारे इन दुर्गुणों को धीरे धीरे समाप्त कर देगी ।

* प्राणायाम करें ।
साधक को यदि साधना में सफलता और अध्यात्मिक मार्ग में लंबी रेस का घोड़ा बनना हो तो यह सबसे आवश्यक है कि आप प्राणायाम के द्वारा एकाग्रता का प्रयास निरंतर करते रहें ।

* इंद्रियों का दमन नहीं करें बल्कि अपनी इंद्रियों को प्रत्येक क्षण धन्यवाद कहें । कल्पना करें कि जिनके पास आँख नहीं है वो कैसे जीते हैं  ? , जिनके पास हाथ , पैर , नहीं है , जो मानसिक संतुलन खो गया उसकी स्थिति क्या होती है ।
जितना आप अपने शरीर के अंगों का सम्मान करेंगे और उनको धन्यवाद देंगे आप पाएंगे कि आपका शरीर और इंद्रियां अपनी पूरी क्षमता से आपको सहयोग करेंगी ।
* प्रकृति के पास रहने का प्रयास करें ।
रोज 1 घंटे भौतिक सुविधाओं और कृत्रिम साधनों से दूर होकर बिलकुल प्राकृतिक माहौल में रहने का प्रयास करें ।
गर्मी में पंखा , ऐ 0सी0 ,कूलर आवश्यक हैं किंतु 1 घंटा शाम को सभी साधनों को बंद करके अपने शरीर को प्रकृति के हवाले करें , पहले पहले आपको विचलन होगा लेकिन 1 महीने रोज ऐसा करने पर एक अलग अनुभव होगा , और आप पाएंगे कि प्रकृति स्वयं आपको धैर्य नामक अद्भुत अश्त्र देगी , यही प्रयोग सर्दियों में भी करें ।

* अध्यात्म को धर्म के तराजू पर कभी ना तोलें ।
जितनी निष्ठा से आप किसी मंदिर के सम्मुख सर झुकाते हैं , उतनी ही निष्ठा किसी मस्जिद , या फिर गुरूद्वारे या चर्च के सामने आने पर भी उस परमात्मा को प्रणाम करें । याद रखिए कि धर्म जब धारणा बन जाता है तो वह तुलना की छलनी में हमारे अहंकार को तोषित करता है , । सभी धर्मों का सम्मान और स्वयम के धर्म का अनुसरण करने से जीवन में सरलता एवं प्रेम का उद्भव होता है ।

मित्रों , आगे भी मैं अपनी बौद्धिक क्षमता के आधार पर अपने विचार रखूंगा , तब तक मुझे आशा है आप अपनी प्रतिक्रियाओं और जानकारियों से मुझे भी सीखने को बहुत कुछ प्राप्त होगा ।
जय माता दी ।
Divine durga spiritual astrology
9041032215