बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

तुम हो आज भी

  तुम हो आज भी
                         मेरा पहला और आखिरी एहसास
                          बचपन की पहली तीस जो आज भी है
                         लेकिन कोई दुःख नहीं कोई विरह नहीं
                         सबने खोया है प्रेम में मैंने पाया है
                         पाया है ये सारा वर्तमान
                        पाया है सम्पूर्ण ज्ञान
                        प्रेम कहो या पूजा कहो
                        भक्ति कहो या अजपा जाप ............

तुम हो आज भी ....
 मेरी हर प्रार्थना में
मेरी हर साधना में
तुमको तो मालूम नहीं होगा मुझे पता है
लेकिन मेरी पूर्णता हो तुम
मेरे रक्त में उष्णता हो तुम
योवन का अनंत प्रथम सावन
कभी न टूटने वाला बंधन
तुम आज किसी के आँगन की तुलसी हो
लेकिन मेरे हर्ष में आज भी तुम बसी हो

तुम हो आज भी ...............
 तुमको शायद मेरा नाम भी याद नहीं होगा
और न ही कोई छवि होगी ह्रदय में
समर्पित होगी तुम अपनी दुनिया में
यही मेरी धारणा थी यही मान्यता थी
एकतरफा होकर भी मेरी पूर्णता थी ......
आज भी हर्षित करते हैं वो चार बसंत काल
आज भी तुम हो और रहोगी अनंत .काल
तुम हो आज भी ............................................................. मनोज