बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

मै कौन हूँ ........?

अंतर्मन की आवाजें
सुनी है मैंने जब कभी
शाक्षी हुआ हूँ स्वः में
देखा है एक संग्राम विचारों का
उजड़ते हुए बसते हुए कई गाँव
अपने अंतर्मन में ............

अनगिनत आशाओं के बाग़
और देखी है क्रोध की आग
झुलसते हुए एहसास
पनपते हुए छल पाश
कामनाओं का ज्वार
वासना की फुहार
दौड़ती हुई सारे तन में
अपने अंतर्मन में ..............

देखा है कभी किसी सन्यासी को
कभी भोग रत विलासी को
सहमा हुआ सा एक नवजात बोध
और कभी रक्तिम आँखों में प्रतिशोध
इन्द्रियों का अंतरजाल माया
निशब्द को विचलित होते देखा
अपने अंतर्मन में ..............

ध्यान की गहराई में कहीं दूर
मन के चक्रव्यूह को भेदकर
अन्तः चक्षु को खोलकर
एक टिमटिमाहट देखी
किन्तु सह न पाया उस असीम को
और विचलित होकर याद आया
मै कौन  हूँ .........