मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

कभी रिश्तों में हंगामा कभी सुनसान वीराना


कभी रिश्तों में हंगामा कभी सुनसान वीराना
हुआ है दूर हमसे वो जिसे सब कुछ यहाँ माना ||

हजारों कह्कहें, सुनकर हजारों गीत लिख बैठे
अकेला हूँ , सुनाऊँ अब किसे ग़मगीन अफ़साना ||

मुझे अक्सर शिकायत थी खुदा सुनता नहीं मेरी
कि अब खुद से शिकायत है रजा उसकी नहीं जाना ||

दावा देकर दुआओं की , जहर सी बात करते हो
दुआ रख लो मेरी तुम ये जहर मुझको पिला जाना ||

कभी चलता शहर रुककर मुझे ये बात कहता है
...चलो फिर साथ चलते हैं , यहाँ मुड कर नहीं आना ||

जुआ है जिंदगी हर दिन , कभी तेरा कभी मेरा
कभी मर मर के जीना है कभी जी कर के मर जाना ||

मुझे भी फिर सजाने हैं वही सपने नए घर में
कहाँ वो घर बनाऊं मैं जरा मुझको भी समझाना ||

खयालों में बसे हो तुम , तुम्हारी याद इस दिल में
तुम्हे जब भी यकीं हो दर खुला है लौट आ जाना ||.........मनोज