बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

...कभी तो रात गुजरेगी

...कभी तो रात गुजरेगी उजाला फिर से छायेगा 
कभी तो सच यहाँ पर फिर पुराना घर सजायेगा ||


बहुत  जालिम निगाहों ने जला डाले कई सपने 
कोई तो ख्वाब बच करके नया मंजर दिखायेगा ||


....पडोसी के घरों में क्रांति की क्यूँ बात करते हो 
भगत फिर कौन जाने किस के घर में लौट आएगा ||


सभी धर्मों को लड़ते देख कर अफसोच होता है 
न जाने किस शहर में फिर कोई रसखान गायेगा ||


सभी अर्जुन पड़े हैं मोह के वश में जमाने भर 
न जाने कृष्ण फिर कब गीत गीता का सुनाएगा ||


हजारों लोग मरते हैं कभी मंदिर कभी मस्जिद 
........लहू के रंग को कोई कभी तो देख पायेगा ||


पुरातन की बची जड़ भी किसी ने खोद डाली हैं 
कोई माली कभी क्या फिर इसे गहरे दबाएगा ||

दबे पाओं चली है मौत सबके घर मिटाने को 
जरा फिर गौर से सुन ले नहीं फिर सुन न पायेगा || ....................manoj