बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

..अहंकार की सीमाओं में प्रेम बदरिया नहीं बरसती

..अहंकार की सीमाओं में प्रेम बदरिया नहीं बरसती
भेद भावना की बस्ती में ज्योति ज्ञान की नहीं सुलगती
चुभे नहीं कांटे जिस ऊँगली में वो परपीड़ा नहीं समझती
.....नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती ....

अधजल गगरी जितना थामो छलक छलक गिर जाती है
.......ज्वाला एक दिन क्रोध की अपने ही घर लग जाती है
काजल को कितना भी धो दो उसकी रंगत नहीं निखरती
.....नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती ....

टेढ़ी लकड़ी को सब केवल आग लगाकर ही तपते हैं
......बंजर जंगल में केवल जहरीले विचरण करते हैं
गोभी के फूलों की खुसबू उपवन में नहीं बिखरती
.....नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती ....

तिल का ताड़ बनाने वाले बीमारी के पंजर केवल
बगिया को बंजर करते हैं बिगड़े हुए जानवर केवल
पेड़ खजूर तले इन्सां को छावं कभी भी नहीं पसरती
.....नाम नयन सुख रख देने से अंधी आँखें नहीं सुधरती ....मनोज