सोमवार, 25 नवंबर 2013

सोच रहा हूँ आज कलम को अपने मन की बात बता दूँ




सोच रहा हूँ आज कलम को अपने मन की बात बता दूँ 
टूटे बिखरे सहमे घायल बीते सब जज्बात बता दूँ ||


ढाई आखर सुनकर कैसे भटक गया था मन बैरागी 
उस मायावी बीते कल की आज तुम्हे शुरुआत बता दूँ ||


लिखा नहीं जो अब तक मैंने सच के कोरे भोजपत्र पर 
क्यूँ जीवन अभिनय बन बैठा वो सारे हालात बता दूं ||


अब तक जिसने भी खोजा है मुझको मेरी रचनाओं में 
उन सारे अनुमानों का मै सही गलत अनुपात बता दूँ ||


बरसों पहले शुरू हुयी थी काली रात अमावास की जो 
अब तक कैसे नहीं हुयी है उसकी नव प्रभात बता दूँ ||


कैसे नफरत की छेनी से गढ़ा गया कोरे पत्थर को 
इस मूरत पर शिल्पकार के दिए हुए आघात बता दूँ ||


चाहत की मंडी में मैंने सारी खुशियाँ मुफ्त बाँट दी 
दर्द भरी दुनिया ये मुझको किसने दी सौगात बता दूँ ||


सोच रहा हूँ आज कलम को अपने मन की बात बता दूँ 
टूटे बिखरे सहमे घायल बीते सब जज्बात बता दूँ ||


मनोज नौटियाल